श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d185
 
 
श्लोक  13.160.d185 
पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्ट्या कर्षका इव।
पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति॥
 
 
अनुवाद
जिस व्यक्ति का पुत्र या पौत्र श्रोत्रिय ब्राह्मण को भोजन कराता है, उसके पूर्वज उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे अच्छी वर्षा होने पर किसान प्रसन्न होता है।
 
The forefathers of a person whose son or grandson feeds a Shrotri Brahmin are pleased like a farmer on receiving good rain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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