श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d180-d181
 
 
श्लोक  13.160.d180-d181 
श्रीमहेश्वर उवाच
अजस्रं धर्मकार्यं च तथा नैमित्तिकं प्रिये।
अन्नं प्रतिश्रयो दीप: पानीयं तृणमिन्धनम्॥
स्नेहो गन्धश्च भैषज्यं तिलाश्च लवणं तथा।
एवमादि तथान्यच्च दानमाजस्रमुच्यते॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - हे प्रिये! मनुष्य को निरन्तर धार्मिक तथा नैमित्तिक कर्म करते रहना चाहिए। अन्न, आश्रय, दीप, जल, घास, ईंधन, तेल, सुगंध, औषधि, तिल और नमक - ये तथा और भी बहुत सी वस्तुएं निरन्तर दान करने योग्य बताई गई हैं।
 
Shri Maheshwar said-Dear! One should continuously perform religious and casual activities. Food, shelter, lamp, water, grass, fuel, oil, fragrance, medicine, sesame seeds and salt – these and many more things have been mentioned as the things to be donated continuously.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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