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mahabharat 13.160.d179: उसने पूछा, "हे प्रभु! धर्म के लिए मनुष्यों को किन वस्तुओं का दान करना चाहिए? मैं यह सुनना चाहती हूँ। कृपया मुझे बताइए।"   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d179
 
 
श्लोक  13.160.d179 
उमोवाच
भगवन् कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवै:।
तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उसने पूछा, "हे प्रभु! धर्म के लिए मनुष्यों को किन वस्तुओं का दान करना चाहिए? मैं यह सुनना चाहती हूँ। कृपया मुझे बताइए।"
 
She asked - O Lord! What things should people donate for the purpose of religion? I want to hear this. Please tell me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)