Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.160.d173-d174: श्री महेश्वर बोले - हे महात्मन! यह भी मनुष्यों की दोषपूर्ण भावनाओं के कारण होता है। यदि कोई व्यक्ति विधिपूर्वक धर्म का पालन करने के बाद उसके लिए पश्चाताप करने लगे या भरी सभा में उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी-बड़ी बातें करने लगे, तो उसका वह धर्म निष्फल हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d173-d174
 
 
श्लोक  13.160.d173-d174 
श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषत:॥
कृत्वा धर्मं तु विधिवत् पश्चात्तापं करोति चेत्।
श्लाघया वा यदि ब्रूयाद् वृथा संसदि यत् कृतम्॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - हे महात्मन! यह भी मनुष्यों की दोषपूर्ण भावनाओं के कारण होता है। यदि कोई व्यक्ति विधिपूर्वक धर्म का पालन करने के बाद उसके लिए पश्चाताप करने लगे या भरी सभा में उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी-बड़ी बातें करने लगे, तो उसका वह धर्म निष्फल हो जाता है।
 
Shri Maheshwar said - O great one! This also happens due to the faulty feelings of human beings. If someone after performing the Dharma as per the prescribed method starts repenting for it or starts talking big while praising it in a crowded gathering, then that Dharma of his becomes useless.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)