श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d17
 
 
श्लोक  13.160.d17 
श्रीमहेश्वर उवाच
यो नरोऽनपराधी च स्वात्मप्राणस्य रक्षणात्।
शत्रुमुद्यतशस्त्रं वा पूर्वं तेन हतोऽपि वा॥
प्रतिहन्यान्नरो हिंस्यान्न स पापेन लिप्यते।
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! जो निर्दोष मनुष्य अपने प्राण बचाने के लिए अपने प्राण बचाने आए शत्रु पर पहले हाथ में शस्त्र लेकर आक्रमण करता है और फिर प्रत्युत्तर में उस पर आक्रमण करके उसे मार डालता है, वह किसी पाप में लिप्त नहीं होता।
 
Shri Maheshwar said - Devi! An innocent person who first attacks the enemy who has come to kill him with a weapon in his hand and then attacks him in return and kills him in order to save his own life is not involved in any sin.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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