श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d165-d166
 
 
श्लोक  13.160.d165-d166 
श्रीमहेश्वर उवाच
कुरुक्षेत्रं महानद्यो यच्च देवर्षिसेवितम्।
गिरिर्वरश्च तीर्थानि देशभागेषु पूजित:॥
ग्रहीतुमीप्सते यत्र तत्र दत्तं महाफलम्॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले, "देवी! कुरुक्षेत्र, गंगा आदि बड़ी नदियाँ, देवताओं और ऋषियों द्वारा सेवित स्थान तथा महान पर्वत - ये सभी तीर्थस्थान हैं। जहाँ देश के सभी भागों में प्रतिष्ठित कोई महापुरुष दान लेना चाहता है, वहाँ दिया गया दान महान फल देता है।"
 
Shri Maheshwar said, "Devi! Kurukshetra, big rivers like Ganga, places served by gods and sages and great mountains - all these are pilgrimage places. Where a great man respected in all parts of the country wants to accept donations, the donation given there yields great results.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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