श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d157-d158
 
 
श्लोक  13.160.d157-d158 
एष दानविधि: श्रेष्ठ: समाहूय तु मध्यम:॥
पूर्वं च पात्रतां ज्ञात्वा समाहूय निवेद्य च।
शौचाचमनसंयुक्तं दातव्यं श्रद्धया प्रिये॥
 
 
अनुवाद
दान की यही सर्वोत्तम विधि है। दान के पात्र व्यक्ति को अपने घर बुलाकर किया गया दान मध्यम श्रेणी का होता है। प्रिय! पहले पात्रता जानकर उस योग्य ब्राह्मण को अपने घर बुलाएँ। उसके समक्ष अपना दान-विचार प्रस्तुत करें। तत्पश्चात स्नान आदि से शुद्ध होकर जल पीकर भक्तिपूर्वक इच्छित वस्तु का दान करें।
 
This is the best method of donation. Donation made by calling a person deserving of donation to your home is of the middle category. Dear! First, after knowing the eligibility, call that deserving Brahmin to your home. Present your idea of ​​donation to him. After that, purify yourself by taking bath etc. and sip water and donate the desired thing with devotion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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