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mahabharat 13.160.d143: श्री महेश्वर बोले - देवी! इस संसार में भौतिक वस्तुएँ सबके लिए समान हैं; इन वस्तुओं का दान करने वाला मनुष्य किस प्रकार पुण्य का भागी बनता है, यह मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d143
 
 
श्लोक  13.160.d143 
श्रीमहेश्वर उवाच
लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा।
तथैव तद् ददन्मर्त्यो लभेत् पुण्यं स तच्छृणु॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! इस संसार में भौतिक वस्तुएँ सबके लिए समान हैं; इन वस्तुओं का दान करने वाला मनुष्य किस प्रकार पुण्य का भागी बनता है, यह मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो।
 
Shri Maheshwar said - Devi! The material things in this world are common to everyone; I am telling you how a person who donates these things becomes a part of virtue, listen.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)