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mahabharat 13.160.d141: इस प्रकार तीर्थों में स्नान करने से पुण्य मिलता है। ये सब पुण्य कर्म जो नियमानुसार किये जाते हैं, वे सब तुमसे कहे गए हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d141
 
 
श्लोक  13.160.d141 
एवं पुण्येषु तीर्थेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत्।
एतन्नैयमिकं सर्वं सुकृतं कथितं तव॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार तीर्थों में स्नान करने से पुण्य मिलता है। ये सब पुण्य कर्म जो नियमानुसार किये जाते हैं, वे सब तुमसे कहे गए हैं।
 
In this way, bathing in holy places is beneficial. All these virtuous deeds that are performed according to the rules have been described to you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)