Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.160.d14-d15: स्वयं द्वारा किये गये तीन प्रकार के पाप कर्ता को पाप योनि में ले जाते हैं। यदि कोई पाप कर्म किसी के प्राण बचाने आदि की नीयत से भी अनिवार्य कर्तव्य मानकर किया जाता है, तो भी कर्ता उसमें सम्मिलित नहीं होता। | mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स्वयं द्वारा किये गये तीन प्रकार के पाप कर्ता को पाप योनि में ले जाते हैं। यदि कोई पाप कर्म किसी के प्राण बचाने आदि की नीयत से भी अनिवार्य कर्तव्य मानकर किया जाता है, तो भी कर्ता उसमें सम्मिलित नहीं होता।
The three types of sins committed by oneself take the doer to a sinful birth. Even if a sinful act is done with the intention of saving someone's life etc. by considering it as an inevitable duty, then the doer is not involved in it.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥