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mahabharat 13.160.d139: प्रिये! हर तीर्थ में सबके लिए स्नान का यही नियम है। दूर के तीर्थ में स्नान करना, पास के तीर्थ में स्नान करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d139
 
 
श्लोक  13.160.d139 
एतद् विधानं सर्वेषां तीर्थं तीर्थमिति प्रिये।
समीपतीर्थस्नानात् तु दूरतीर्थं सुपूजितम्॥
 
 
अनुवाद
प्रिये! हर तीर्थ में सबके लिए स्नान का यही नियम है। दूर के तीर्थ में स्नान करना, पास के तीर्थ में स्नान करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।
 
Darling! This is the rule of bathing for everyone in every pilgrimage. Taking bath in a distant pilgrimage is considered more important than taking a bath in a nearby pilgrimage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)