| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d129 |
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| | | | श्लोक 13.160.d129  | यास्तु लोके महानद्यस्ता: सर्वास्तीर्थसंज्ञिका:।
तासां प्राक्स्रोतस: श्रेष्ठा: सङ्गमश्च परस्परम्॥ | | | | | | अनुवाद | | संसार की सभी बड़ी नदियाँ तीर्थस्थान कहलाती हैं। उनमें से जो पूर्व दिशा की ओर बहती हैं, वे श्रेष्ठ हैं और जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं, वह स्थान भी श्रेष्ठ तीर्थस्थान कहलाता है। | | | | All the big rivers in the world are called pilgrimage places. Among them, those which flow towards the east are the best and the place where two rivers meet is also called the best pilgrimage place. | | ✨ ai-generated | | |
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