श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d128
 
 
श्लोक  13.160.d128 
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि तीर्थस्नानविधिं प्रिये।
पावनार्थं च शौचार्थं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- प्रिये! मैं तुम्हें तीर्थ स्नान की विधि प्रसन्नतापूर्वक बता रहा हूँ, सुनो। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने दूसरों को पवित्र करने तथा स्वयं को पवित्र करने के लिए इस विधि की रचना की थी।
 
Shri Maheshwar said- Dear! I am gladly telling you the method of taking holy bath, listen. In the past, Brahmaji had created this method to purify others and to purify himself.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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