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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d127
 
 
श्लोक  13.160.d127 
उमोवाच
तीर्थचर्याव्रतं देव क्रियते धर्मकांक्षिभि:।
कानि तीर्थानि लोकेषु तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने पूछा - हे प्रभु! बहुत से धार्मिक लोग तीर्थयात्रा का व्रत लेते हैं; तो फिर संसार में कौन-कौन से तीर्थ हैं? कृपया मुझे यह बताइए।
 
He asked - O Lord! Many religious men take the vow of pilgrimage; so which are the pilgrimage places in the world? Kindly tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)