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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d126
 
 
श्लोक  13.160.d126 
ब्रह्मचर्यव्रतफलं लभेद् दारव्रती सदा।
शौचमायुस्तथाऽऽरोग्यं लभ्यते ब्रह्मचारिभि:॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव एक पत्नी के प्रति समर्पित रहता है, उसे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का लाभ मिलता है। ब्रह्मचारियों को पवित्रता, दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
 
He who always remains faithful to one wife, gets the benefits of observing the vow of celibacy. Brahmacharis get purity, longevity and good health.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)