श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d124-d125
 
 
श्लोक  13.160.d124-d125 
तदिष्यते गृहस्थानां कालमुद्दिश्य कारणम्॥
जन्मनक्षत्रयोगेषु पुण्यवासेषु पर्वसु।
देवताधर्मकार्येषु ब्रह्मचर्यव्रतं चरेत् ॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थों के लिए भी यही ब्रह्मचर्य अपेक्षित है, इसका कारण समय है। जन्म-नक्षत्र का संयोग आने पर गृहस्थों को तीर्थस्थानों में, पर्वों पर तथा देवताओं से संबंधित धार्मिक कार्यों के समय ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए।
 
The same celibacy is desired for householders also, time is the reason behind it. When the conjunction of the birth-star comes, the householders must observe the fast of celibacy in holy places, on festival days and during religious activities related to deities.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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