| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d120-d121 |
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| | | | श्लोक 13.160.d120-d121  | श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता॥
ब्रह्मचर्यं परं शौचं ब्रह्मचर्यं परं तप:।
केवलं ब्रह्मचर्येण प्राप्यते परमं पदम्॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री महेश्वर बोले- देवी! मैं यह विषय तुमसे कह रहा हूँ, इसे एकाग्र होकर सुनो। ब्रह्मचर्य ही उत्तम शौच है, ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है और ब्रह्मचर्य से ही परमपद की प्राप्ति होती है। | | | | Shri Maheshwar said- Devi! I am telling you this topic, listen with concentration. Celibacy is the best cleanliness, celibacy is the best penance and only celibacy leads to the attainment of the supreme state. | | ✨ ai-generated | | |
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