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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d119
 
 
श्लोक  13.160.d119 
उमोवाच
ब्रह्मचर्यं कथं देव रक्षितव्यं विजानता॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने पूछा - हे प्रभु! बुद्धिमान पुरुष को अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा किस प्रकार करनी चाहिए?
 
He asked - O Lord! How should a wise man protect his celibacy?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)