| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d116-d117 |
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| | | | श्लोक 13.160.d116-d117  | तस्मात् पुण्यं लभेन्मर्त्य: स्वयमाहारकर्शनात्॥
तद् गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चय:॥ | | | | | | अनुवाद | | अतः सिद्ध है कि अपना आहार कम करके मनुष्य निश्चय ही पुण्य का भागी बनता है। अतः गृहस्थों को यथासम्भव अपने आहार पर संयम रखना चाहिए, यह शास्त्रों का निश्चित आदेश है। | | | | Hence, it is proved that by reducing one's own diet, a person definitely becomes a partaker of virtue. Therefore, householders should control their diet as much as possible, this is a definite order of the scriptures. | | ✨ ai-generated | | |
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