श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d114
 
 
श्लोक  13.160.d114 
श्रीमहेश्वर उवाच
शरीरमलशान्त्यर्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च।
एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नरा:॥
लभन्ते विपुलं धर्मं तथाऽऽहारपरिक्षयात् ।
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- प्रिये! शारीरिक दोषों की पूर्ति के लिए तथा इन्द्रियों को सुखाकर उन्हें वश में करने के लिए मनुष्य एक समय भोजन करके अथवा दोनों समय उपवास करके व्रत करते हैं और आहार कम करके महान धर्म का फल प्राप्त करते हैं।
 
Shri Maheshwar said-Dear! In order to satisfy the physical defects and to control the senses by drying them, people observe fast by eating one meal or fasting both the times and by reducing their diet they get the fruits of great religion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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