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mahabharat 13.160.d112: जो लोग मन, वचन और कर्म से अपने उपाध्याय, पिता और माता का द्रोह करते हैं, वे भ्रूण-हत्या से भी बड़ा पाप करते हैं। उनसे बढ़कर इस संसार में कोई पापी नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d112
 
 
श्लोक  13.160.d112 
उपाध्यायं पितरं मातरं च
येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तेभ्यो नान्य: पापकृदस्ति लोके॥
 
 
अनुवाद
जो लोग मन, वचन और कर्म से अपने उपाध्याय, पिता और माता का द्रोह करते हैं, वे भ्रूण-हत्या से भी बड़ा पाप करते हैं। उनसे बढ़कर इस संसार में कोई पापी नहीं है।
 
Those who betray their Upadhyaya, father and mother by their thoughts, words and actions, commit a sin greater than that of killing an embryo. There is no one more sinful than them in this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)