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mahabharat 13.158.d8: यदि उद्देश्य कुटिल न हो, अपितु धर्म के अभिमान से शुद्ध हो, तो पापियों के प्रति ऐसा व्यवहार करने में कोई दोष नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d8
 
 
श्लोक  13.158.d8 
अभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात्।
एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयु: क्वचित् ॥
 
 
अनुवाद
यदि उद्देश्य कुटिल न हो, अपितु धर्म के अभिमान से शुद्ध हो, तो पापियों के प्रति ऐसा व्यवहार करने में कोई दोष नहीं है।
 
If the motive is not devious, but is pure out of the pride of religion, then there is no fault in behaving like this towards sinners.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)