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mahabharat 13.158.d64-d65: शास्त्रों के अप्रत्यक्ष वचनों को सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होने के कारण, बहुत से लोग इस बात में संशय में रहते हैं कि परलोक है ही नहीं। इस मतभेद में वास्तविकता क्या है? कृपया मुझे यह बताएँ। हे प्रभु! आपने जो कुछ बताया है, वही संसार की स्थिति है।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d64-d65
 
 
श्लोक  13.158.d64-d65 
परोक्षवचनं श्रुत्वा न प्रत्यक्षस्य दर्शनात्।
तत् सर्वं नास्ति नास्तीति संशयस्थास्तथा परे॥
पक्षभेदान्तरे चास्मिंस्तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि।
उक्तं भगवता यत् तु तत् तु लोकस्य संस्थिति:॥
 
 
अनुवाद
शास्त्रों के अप्रत्यक्ष वचनों को सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होने के कारण, बहुत से लोग इस बात में संशय में रहते हैं कि परलोक है ही नहीं। इस मतभेद में वास्तविकता क्या है? कृपया मुझे यह बताएँ। हे प्रभु! आपने जो कुछ बताया है, वही संसार की स्थिति है।
 
Having heard the indirect words of the scriptures and not having direct vision, many people are in doubt that the other world does not exist. What is the reality in this difference of opinion? Kindly tell me this. O Lord! Whatever you have told is the state of the world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)