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mahabharat 13.158.d56: फल केवल ईश्वर या पुरुषार्थ से ही प्राप्त नहीं होता। प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य, पुरुषार्थ और ईश्वर, दोनों से ही जुड़ा हुआ है।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d56
 
 
श्लोक  13.158.d56 
केवलं फलनिष्पत्तिरेकेन तु न शक्यते।
पौरुषेणैव दैवेन युगपद् ग्रथितं प्रिये॥
 
 
अनुवाद
फल केवल ईश्वर या पुरुषार्थ से ही प्राप्त नहीं होता। प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य, पुरुषार्थ और ईश्वर, दोनों से ही जुड़ा हुआ है।
 
Fruits are not achieved only by God or efforts. Darling! Every object or work is simultaneously entangled with both effort and God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)