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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d41
 
 
श्लोक  13.158.d41 
उमोवाच
भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम्।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उसने पूछा - हे प्रभु! लोग सोते ही स्वप्न देखने लगते हैं। क्या यही उनका स्वभाव है या कुछ और? कृपया मुझे यह बताइए।
 
He asked - O Lord! People start seeing dreams just by sleeping. Is this their nature or is there something else? Please tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)