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mahabharat 13.158.d4: यदि राजा अपनी प्रजा को उसके अपराधों के लिए दण्ड देता है, फटकार लगाता है, तो भी उसे पुण्य का भाग मिलता है। यदि गुरु अपने शिष्यों को और स्वामी अपने सेवकों को उनकी उन्नति के लिए डाँटता है, तो भी उसे सुख का भाग मिलता है।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  13.158.d4 
दण्डयन् भर्त्सयन् राजा प्रजा: पुण्यमवाप्नुयात्।
गुरु: संतर्जयन् शिष्यान् भर्ता भृत्यजनान् स्वकान्॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा अपनी प्रजा को उसके अपराधों के लिए दण्ड देता है, फटकार लगाता है, तो भी उसे पुण्य का भाग मिलता है। यदि गुरु अपने शिष्यों को और स्वामी अपने सेवकों को उनकी उन्नति के लिए डाँटता है, तो भी उसे सुख का भाग मिलता है।
 
Even if the king punishes and reprimands his subjects for their crimes, he still gets a share of virtue. If the Guru reprimands his disciples and the master reprimands his servants for their improvement, then he gets a share of happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)