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mahabharat 13.158.d18: इस संसार में रात्रि का अंधकार प्रकाश या तेज से नष्ट हो जाता है; किन्तु शरीर से उत्पन्न अंधकार सभी प्रकाशों के प्रज्वलित होने पर भी शांत नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d18
 
 
श्लोक  13.158.d18 
ज्योतिर्भिश्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम्।
देहजं तु तमो लोके तै: समस्तैर्न शाम्यति॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में रात्रि का अंधकार प्रकाश या तेज से नष्ट हो जाता है; किन्तु शरीर से उत्पन्न अंधकार सभी प्रकाशों के प्रज्वलित होने पर भी शांत नहीं होता।
 
In this world, the darkness of night is destroyed by light or brilliance; however, the darkness generated by the body is not pacified even when all the lights are lit.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)