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mahabharat 13.158.d14: प्रिये! उद्भिज्ज जीव पृथ्वी और जल के संयोग से उत्पन्न होते हैं और स्वदज जीव शीत और उष्ण के संयोग से जीवन धारण करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d14
 
 
श्लोक  13.158.d14 
तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजा: प्रिये।
शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजा: प्रिये॥
 
 
अनुवाद
प्रिये! उद्भिज्ज जीव पृथ्वी और जल के संयोग से उत्पन्न होते हैं और स्वदज जीव शीत और उष्ण के संयोग से जीवन धारण करते हैं।
 
Darling! Udbhijja creatures are born from the combination of earth and water and Swadaj creatures take life from the combination of cold and heat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)