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mahabharat 13.158.d10: श्री महेश्वर बोले - देवि! यह संसार स्थावर और जंगम दो प्रकार का पाया जाता है। इसमें प्राजाकी की क्रमशः चार योनियाँ हैं - जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज।   |   mahabharat अध्याय 13.158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.158.d10 
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते।
चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवि! यह संसार स्थावर और जंगम दो प्रकार का पाया जाता है। इसमें प्राजाकी की क्रमशः चार योनियाँ हैं - जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज।
 
Shri Maheshwar said – Goddess! This world is found to be of two types – immovable and movable. In this, Prajaki has four vaginas respectively – Jarayuj, Andaj, Swedaj and Udbhijja.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)