| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन] » श्लोक d93-d94 |
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| | | | श्लोक 13.157.d93-d94  | दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति।
कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता॥
रजसश्चोद्भवं चैतत् कर्म नानाविधं सदा॥ | | | | | | अनुवाद | | कार्यकुशलता, काम में लगन, लोभ, धर्म में आसक्ति, स्त्रियों का संग, मधुरता और ऐश्वर्य के प्रति सदैव लोभ - ये विविध प्रकार के भाव और कर्म रजोगुण से प्रकट होते हैं। | | | | Efficiency, devotion to work, greed, attachment to law, company of women, sweetness and always greed for opulence – these various types of feelings and actions are manifested from Rajo Guna. | | ✨ ai-generated | | |
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