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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]  »  श्लोक d90-d91
 
 
श्लोक  13.157.d90-d91 
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिण:।
प्रकाशात्मकमेतेषां सत्त्वं सततमिष्यते॥
रजो दु:खात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम्।
त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते॥
 
 
अनुवाद
सत्व, रज और तम - ये तीन देहधारी जीव के गुण हैं। इनमें सत्व को सदैव प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण को दुःख और तमोगुण को आसक्ति बताया गया है। इस संसार में इन्हीं तीन गुणों से युक्त कर्म की प्रवृत्ति होती है।
 
Sattva, Raja and Tama – these three are the qualities of the bodily being. Among these, Sattva has always been considered to be the form of light. Rajogun has been described as sorrow and Tamoguna as attachment. In this world, there is a tendency towards action consisting of these three qualities.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)