श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]  »  श्लोक d89
 
 
श्लोक  13.157.d89 
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलै:।
व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणै:॥
 
 
अनुवाद
संसार में जीवों का शरीर वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों से व्याप्त है, उसी प्रकार जीव सत्व, रज और तम गुणों से व्याप्त हैं।
 
The body of living beings in the world is pervaded by the three doshas of Vata, Pitta and Kapha, similarly the living beings are pervaded by the qualities of Sattva, Raja and Tama.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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