श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]  »  श्लोक d69-d70
 
 
श्लोक  13.157.d69-d70 
यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानव:।
तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणत:।
इति ते कथितं देवि निर्विशङ्का भव प्रिये॥
 
 
अनुवाद
जब तक पूर्व कर्म (प्रारब्ध) शेष रहता है, तब तक मनुष्य जीवित रहता है। उस कर्म के अधीन होकर, प्रारब्ध भोग की अवधि समाप्त होने पर बालक भी मर जाते हैं और उस कर्म की मात्रा के अनुसार वृद्ध भी दीर्घायु होते हैं। देवि! यह सब तुम्हें बताया गया है। प्रिये, अब तुम्हें इस विषय में संशय मुक्त होना चाहिए।
 
As long as the previous karma (destiny) remains, a man remains alive. Being subject to that karma, when the period of enjoying destiny is over, even children die and according to the amount of that karma, even old men live for a long time. Devi! All this has been told to you. Dear, now you should be free from doubts in this matter.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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