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mahabharat 13.157.d64: जैसे आकाश में कोई भी भौतिक वस्तु स्थिर नहीं रह सकती, वैसे ही यह काल भी निरन्तर चलता रहता है। यह एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता।   |   mahabharat अध्याय 13.157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.157.d64 
यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम्।
तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति॥
 
 
अनुवाद
जैसे आकाश में कोई भी भौतिक वस्तु स्थिर नहीं रह सकती, वैसे ही यह काल भी निरन्तर चलता रहता है। यह एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता।
 
Just as no material thing can remain stable in the sky, similarly this time keeps running continuously. It does not remain stable even for a moment.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)