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mahabharat 13.157.d32: यदि कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति की इच्छा रखता है और क्रोधवश कोई बुरा कार्य करता है तो उसका वह कार्य किसी भी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता।   |   mahabharat अध्याय 13.157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.157.d32 
केवलं चाभिसंधाय संरम्भाच्च करोति यत्।
कर्मणस्तस्य नाशस्तु न कथंचन विद्यते॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति की इच्छा रखता है और क्रोधवश कोई बुरा कार्य करता है तो उसका वह कार्य किसी भी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता।
 
If a person desires to achieve his objective and does an evil deed with anger, then his deed cannot be destroyed in any way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)