श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]  »  श्लोक d30
 
 
श्लोक  13.157.d30 
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता।
संशयो हि महानेव पूर्वेषां च मनीषिणाम्॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले, "देवी! तुमने ठीक ही शंका की है। अब एकाग्र होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो। यह महान शंका पूर्वकाल के महर्षियों के मन में भी रही है।"
 
Shri Maheshwar said- Devi! You have raised the right doubt. Now concentrate and listen to its real answer. This great doubt has been there in the minds of the great sages of earlier times too.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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