श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]  »  श्लोक d23-d24
 
 
श्लोक  13.157.d23-d24 
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता॥
ये नृपैर्दण्डिता भूमावपराधापदेशत:।
यमलोके न दण्ड्यन्ते तत्र ते यमदण्डनै:॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- देवी! तुम्हारी शंका सत्य है, मन को एकाग्र करो और इसका सत्य उत्तर सुनो। इस पृथ्वी पर राजा लोग अपराध के लिए प्रजा को नाम देकर दण्ड देते हैं, किन्तु यमलोक में यमराज द्वारा उस अपराध के लिए उन्हें दण्ड नहीं दिया जाता।
 
Shri Maheshwar said- Devi! Your doubt is correct, concentrate your mind and listen to its true answer. The kings on this earth punish the people by naming them for the crime, but they are not punished by Yamraj in Yamaloka for that crime.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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