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श्लोक 13.157.d104  |
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगति: स्मृता।
एतत् ते कथितं देवि किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ |
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| अनुवाद |
| प्राचीन काल से ही इस संसार में आत्मा का यही भाग्य रहा है। देवी! ये सब बातें आपको बताई जा चुकी हैं। अब आप और क्या सुनना चाहती हैं? |
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| Since ancient times, such is the fate of the soul in this world. Devi! All these topics have been told to you. What else do you want to hear? |
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(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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