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mahabharat 13.157.d103: शरीर तो नष्ट हो जाता है, पर आत्मा नहीं। उसे कष्ट भी नहीं होता। जब तक कर्मफल शेष रहता है, आत्मा इसी शरीर में रहती है और कर्मों के क्षीण होने पर पुनः चली जाती है।   |   mahabharat अध्याय 13.157: उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.157.d103 
देह: क्षयति नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते।
तिष्ठेत् कर्मफलं यावद् व्रजेत् कर्मक्षये पुन:॥
 
 
अनुवाद
शरीर तो नष्ट हो जाता है, पर आत्मा नहीं। उसे कष्ट भी नहीं होता। जब तक कर्मफल शेष रहता है, आत्मा इसी शरीर में रहती है और कर्मों के क्षीण होने पर पुनः चली जाती है।
 
The body decays, but not the soul. It is not even disturbed by pain. As long as the results of karma remain, the soul remains in this body and goes away again when the karmas are exhausted.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)