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mahabharat 13.156.d48-d50: श्री महेश्वर बोले - देवि! जो मनुष्य क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर भगवान के स्थान को अपने पैरों से अपवित्र करते हैं तथा घुटनों और एड़ियों से प्रहार करके प्राणियों की हिंसा करते हैं; सोभने! ऐसे आचरण वाले मनुष्य पुनर्जन्म लेने पर श्वपद आदि नाना प्रकार के पैरों के रोगों से पीड़ित होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.156: अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 156: अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]  »  श्लोक d48-d50
 
 
श्लोक  13.156.d48-d50 
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि क्रोधलोभसमन्विता:।
मनुजा देवतास्थानं स्वपादैर्भ्रंशयन्त्युत॥
जानुभि: पार्ष्णिभिश्चैव प्राणिहिंसां प्रकुर्वते॥
एवंयुक्तसमाचारा: पुनर्जन्मनि शोभने।
पादरोगैर्बहुविधैर्बाध्यन्ते श्वपदादिभि:॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवि! जो मनुष्य क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर भगवान के स्थान को अपने पैरों से अपवित्र करते हैं तथा घुटनों और एड़ियों से प्रहार करके प्राणियों की हिंसा करते हैं; सोभने! ऐसे आचरण वाले मनुष्य पुनर्जन्म लेने पर श्वपद आदि नाना प्रकार के पैरों के रोगों से पीड़ित होते हैं।
 
Shri Maheshwar said – Goddess! Those people who, under the influence of anger and greed, desecrate the place of God with their feet and do violence to living beings by hitting them with their knees and heels; Sobhne! People with such behavior suffer from various types of foot diseases like shwapad etc. when they take rebirth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)