श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमावृता:।
प्राणिनां प्राणहिंसार्थमङ्गविघ्नं प्रकुर्वते॥
शस्त्रेणोत्कृत्य वा देवि प्राणिनां चेष्टनाशका:॥
एवंयुक्तसमाचारा: पुनर्जन्मनि शोभने।
तदङ्गहीना वै प्रेत्य भवन्त्येव न संशय:॥
स्वभावतो वा जाता वा पङ्गवस्ते भवन्ति वै॥
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! जो मनुष्य लोभ और मोह से आवृत होकर प्राणियों को मारने के लिए पहले उनके शरीर को क्षत-विक्षत करते हैं, फिर शस्त्रों से काटकर उन्हें जड़ बना देते हैं, वे अच्छे नहीं हैं! ऐसे आचरण वाले पुरुष मृत्यु के बाद पुनर्जन्म लेते समय अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वे स्वभाव से ही अपंग होकर जन्म लेते हैं या जन्म के बाद अपंग हो जाते हैं।
Shri Maheshwar said - Devi! Those men who, being covered with greed and attachment, first maim the bodies of living beings in order to kill them, cut them with weapons and make them immobile, are not good! Men with such conduct are limbless when they are reborn after death; there is no doubt about this. They are born as crippled by nature or become crippled after birth.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)