श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 156: अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]  »  श्लोक d2-d4
 
 
श्लोक  13.156.d2-d4 
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा कामकारेण परवेश्मसु लोलुपा:।
परस्त्रियोऽभिवीक्षन्ते दुष्टेनैव स्वचक्षुषा॥
अन्धीकुर्वन्ति ये मर्त्या: क्रोधलोभसमन्विता:।
लक्षणज्ञाश्च रूपेषु अयथावत्प्रदर्शका:॥
एवंयुक्तसमाचारा: कालधर्मवशास्तु ते।
दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - हे प्रिये! जो लोग पूर्वजन्म में काम या स्वेच्छा से दूसरों के घर में वासना का प्रदर्शन करते हैं और पराई स्त्रियों पर कुदृष्टि डालते हैं तथा जो क्रोध और लोभ के कारण दूसरों को अन्धा कर देते हैं अथवा सुन्दरता के लक्षण जानकर भी उनका मिथ्या प्रदर्शन करते हैं, ऐसे लोग मृत्यु के पश्चात यम के दण्ड से दण्डित होकर दीर्घकाल तक नरक में रहते हैं।
 
Shri Maheshwar said - Dear! Those who in their previous life, due to lust or self-will, display their lust in other's houses and cast their evil eyes on other's women, and those who blind others due to anger and greed, or knowing the characteristics of beauty, display them falsely, such people are punished by the punishment of Yama after death and remain in hell for a long time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)