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mahabharat 13.155.d67-d68: उन्होंने पूछा, "हे प्रभु! हे देवों के देव! कुछ मनुष्य ज्ञान, बुद्धि, बुद्धि और ज्ञान से संपन्न होने पर भी बुरी स्थिति में पाए जाते हैं। वे उचित प्रयास करने पर भी उस बुरी स्थिति से मुक्त नहीं हो पाते। ऐसा किस कर्मफल के कारण होता है? कृपया मुझे यह बताएँ।"   |   mahabharat अध्याय 13.155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]  »  श्लोक d67-d68
 
 
श्लोक  13.155.d67-d68 
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वपि केचन।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना बुद्धिमन्तो विचक्षणा:॥
दुर्गतास्तु प्रदृश्यन्ते यतमाना यथाविधि।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने पूछा, "हे प्रभु! हे देवों के देव! कुछ मनुष्य ज्ञान, बुद्धि, बुद्धि और ज्ञान से संपन्न होने पर भी बुरी स्थिति में पाए जाते हैं। वे उचित प्रयास करने पर भी उस बुरी स्थिति से मुक्त नहीं हो पाते। ऐसा किस कर्मफल के कारण होता है? कृपया मुझे यह बताएँ।"
 
He asked- O Lord! O Lord of gods! Some of the human beings are found to be in a bad condition in spite of being endowed with knowledge and wisdom, intelligent and learned. They are unable to escape from that bad condition even after making proper efforts. Due to which karmic consequences does this happen? Please tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)