श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम्॥
रूपयोगात् पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुता:।
विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम्॥
परोपतापिनश्चैव मांसादाश्च तथैव च।
अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नरा:॥
एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिता:।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिता:॥
विरूपा: सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा।
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - कल्याणी! सुनो, मैं तुम्हें इसका कारण बताता हूँ। जो लोग पूर्वजन्म में सुन्दर रूप प्राप्त करके भी अहंकार और दर्प से युक्त होकर कुरूप मनुष्यों की स्तुति-निंदा करके उनका उपहास करते हैं, दूसरों को कष्ट देते हैं, मांस खाते हैं, दूसरों में दोष देखते हैं और सदैव अशुद्ध रहते हैं, ऐसे दुराचारी मनुष्य यमलोक में उत्तम दण्ड पाकर जब पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं, तो कुरूप और आकारहीन होते हैं। इस विषय में विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
Shri Maheshwar said - Kalyani! Listen, I will tell you the reason for this. Those people who, having attained a beautiful form in their previous life, are filled with pride and ego and make fun of ugly people by praising and criticizing them, harass others, eat meat, find faults in others and always remain impure, such immoral people, after getting a good punishment in Yamaloka, when they are born in a human form again, they are ugly and formless. There is no need to think about this.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥