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mahabharat 13.155.d42-d43: उमा ने पूछा - हे प्रभु! देवदेवेश्वर! मनुष्यों में थोड़े से ही लोग सुन्दर, शुभ लक्षणों से युक्त और प्रिय (अत्यन्त मनोहर) दिखाई देते हैं, जिनके कारण यह कर्मविपाक (विपत्ति) घटित होता है? यह मुझे बताइए।   |   mahabharat अध्याय 13.155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]  »  श्लोक d42-d43
 
 
श्लोक  13.155.d42-d43 
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन।
रूपयुक्ता: प्रदृश्यन्ते शुभाङ्का: प्रियदर्शना:॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उमा ने पूछा - हे प्रभु! देवदेवेश्वर! मनुष्यों में थोड़े से ही लोग सुन्दर, शुभ लक्षणों से युक्त और प्रिय (अत्यन्त मनोहर) दिखाई देते हैं, जिनके कारण यह कर्मविपाक (विपत्ति) घटित होता है? यह मुझे बताइए।
 
Uman asked – Lord! Devdeveshwar! Among human beings, only a few people are seen as beautiful, endowed with auspicious traits and loved (absolutely charming), due to which Karmavipaaka (disaster) does this happen? Tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)