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mahabharat 13.155.d28-d29: जैसे बीज बोए बिना फसल नहीं उगती, वैसे ही दान के फल के बारे में भी यही समझना चाहिए - बिना दिए किसी को कुछ नहीं मिलता। मनुष्य को वही मिलता है जो वह देता है। देवी! यह विषय आपको बताया जा चुका है। अब आप और क्या सुनना चाहती हैं?   |   mahabharat अध्याय 13.155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.155.d28-d29 
नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद् दानफलं विदु:।
यद् यद् ददाति पुरुषस्तत् तत् प्राप्नोति केवलम्॥
इति ते कथितं देवि भूय: श्रोतुं किमिच्छसि॥
 
 
अनुवाद
जैसे बीज बोए बिना फसल नहीं उगती, वैसे ही दान के फल के बारे में भी यही समझना चाहिए - बिना दिए किसी को कुछ नहीं मिलता। मनुष्य को वही मिलता है जो वह देता है। देवी! यह विषय आपको बताया जा चुका है। अब आप और क्या सुनना चाहती हैं?
 
Just as crops do not grow without sowing seeds, the same should be understood about the fruits of charity - no one gets anything without giving. A man gets only that which he gives. Devi! This topic has been told to you. What else do you want to hear now?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)