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mahabharat 13.155.d10-d12: श्री महेश्वर बोले - देवी! जो लोग दूसरों की प्रेरणा से, स्वेच्छा से नहीं, धर्म करते हैं, और जो श्रद्धा के बिना दान या धर्म करते हैं, फिर उसके लिए रोते या पश्चाताप करते हैं, वे अच्छे हैं! ऐसे लोग मरने और फिर जन्म लेने पर कभी धर्म का फल नहीं भोगते। वे केवल उस धन की रखवाली करते रहते हैं, जैसे कोई धनकोष की रखवाली करता है और उसे बढ़ाते रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.155: विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.155.d10-d12 
श्रीमहेश्वर उवाच
परै: संचोदिता धर्मं कुर्वते न स्वकामत:।
धर्मश्रद्धां बहिष्कृत्य कुर्वन्ति च रुदन्ति च॥
तादृशा मरणं प्राप्ता: पुनर्जन्मनि शोभने।
फलानि तानि सम्प्राप्य भुञ्जते न कदाचन॥
रक्षन्तो वर्धयन्तश्च आसते निधिपालवत्॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! जो लोग दूसरों की प्रेरणा से, स्वेच्छा से नहीं, धर्म करते हैं, और जो श्रद्धा के बिना दान या धर्म करते हैं, फिर उसके लिए रोते या पश्चाताप करते हैं, वे अच्छे हैं! ऐसे लोग मरने और फिर जन्म लेने पर कभी धर्म का फल नहीं भोगते। वे केवल उस धन की रखवाली करते रहते हैं, जैसे कोई धनकोष की रखवाली करता है और उसे बढ़ाते रहते हैं।
 
Shri Maheshwar said - Devi! Those who perform Dharma by being inspired by others, not voluntarily, and who do charity or Dharma without faith, and then cry or repent for it, are good! Such people, when they die and are born again, never enjoy the fruits of Dharma. They only keep guarding that wealth like a guard guarding a treasury and keep increasing it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)