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mahabharat 13.154.d30: जिस प्रकार से सेवा प्राप्त करने वाला स्वामी संतुष्ट होता है, उसी प्रकार उसे संतुष्ट करना चाहिए। सेवक के गुणों से युक्त होकर, अपने आप को स्वामी पर आश्रित रखना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d30
 
 
श्लोक  13.154.d30 
यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम्।
अनुजीविगुणोपेत: कुर्यादात्मानमाश्रितम्॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार से सेवा प्राप्त करने वाला स्वामी संतुष्ट होता है, उसी प्रकार उसे संतुष्ट करना चाहिए। सेवक के गुणों से युक्त होकर, अपने आप को स्वामी पर आश्रित रखना चाहिए।
 
In the same way as the master being served is satisfied, in the same way one should satisfy him. Endowed with the qualities of a servant, one should keep oneself dependent on the master.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)