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mahabharat 13.154.d21-d23: हे देवी! यदि तुम विद्या द्वारा जीविकोपार्जन करना चाहती हो, तो तुम्हें शुशारूषा आदि सद्गुणों से युक्त गुरु से राजविद्या या लोकविद्या की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए तथा शास्त्र और अर्थ के अध्ययन द्वारा उसे प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d21-d23
 
 
श्लोक  13.154.d21-d23 
यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेदथात्मन:॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युत:॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नत:॥
 
 
अनुवाद
हे देवी! यदि तुम विद्या द्वारा जीविकोपार्जन करना चाहती हो, तो तुम्हें शुशारूषा आदि सद्गुणों से युक्त गुरु से राजविद्या या लोकविद्या की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए तथा शास्त्र और अर्थ के अध्ययन द्वारा उसे प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करना चाहिए।
 
Goddess! If you wish to earn your living through education, then you should acquire the education of Rajvidya or Lokvidya from a guru who is full of good qualities like Shusharusha etc. and strengthen it with efforts through study of scriptures and artha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)