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mahabharat 13.154.d20: ईश्वर का चिंतन करने से मनुष्य सत्पुरुषों के लिए भी पूजनीय हो जाता है। आत्मा को पहले कुल-परम्परा से प्राप्त सत्कर्म का आश्रय लेना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  13.154.d20 
भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीय: सतामपि॥
कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत्।
 
 
अनुवाद
ईश्वर का चिंतन करने से मनुष्य सत्पुरुषों के लिए भी पूजनीय हो जाता है। आत्मा को पहले कुल-परम्परा से प्राप्त सत्कर्म का आश्रय लेना चाहिए।
 
By thinking about God, a man becomes worship-worthy even for the good men. The soul should first take refuge in the good conduct inherited from the family tradition.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)